यह एक पत्रकार के रूप में कोरोना के समय का अनुभव है। बहुत समय पहले, मुझे एहसास हुआ था कि कोरोना महामारी दुनिया के अन्य हिस्सों में फैल गई है और भारत में भी दस्तक देनेवाली है। एक पत्रकार के रूप में मैंने सालों पहले अपने अखबार ‘संदेश’ में, दुनिया में स्पैनिश फ्लू जैसी भयानक महामारी और उसके खतरनाक परिणामों के बारे में लिखा था। कोरोना के भारत आने से पहले इस विषय पर फिर से शोध शुरू किया। सालों पहले स्पैनिश फ्लू पूरी दुनिया में फैला था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान एक यूरोपीय देश में एक सैन्य अड्डे से महामारी फैल गई। उस समय सैन्य शिविर की बैरक में वेंटिलेशन के लिए खिड़कियां भी नहीं थीं। इसके कारण कुछ बीमार सैनिकों ने स्पेनिश फ्लू फैला दिया। स्पैनिश फ्लू ने भारत को भी चपेट में ले लिया। गांधीजी को भी स्पैनिश फ्लू हुआ था, लेकिन वे ठीक हो गए थे। स्पैनिश फ्लू एक प्रकार का इन्फ्लूएंजा था। यह स्पेन से नहीं फैला था, लेकिन इस बीमारी की पहचान स्पेन में हुई थी इसलिए इसका नाम स्पैनिश फ्लू पड़ा। उस अवधि के दौरान स्पैनिश फ्लू ने दुनियाभर में ५ करोड से अधिक लोगों की जान ले ली। भारत में भी लाखों लोग मारे गए।१९१९ की अवधि में गुजरात में प्लेग फैल गया। अकेले गुजरात के खेड़ा जिले में प्लेग से ३६,००० लोगों की मौत हो गई। उस समय सरदार वल्लभभाई पटेल अहमदाबाद नगरपालिका के अध्यक्ष थे। अहमदाबाद शहर में प्लेग ने इतने लोगों की जान ले ली, कि उनका अंतिम संस्कार उनके इलाकों में ही करना पड़ा। इस स्थिति में कुछ लोगों ने सरदार पटेल को अहमदाबाद शहर छोड़ने की सलाह दी। लेकिन सरदार साहब ने शहर छोड़ने से इनकार कर दिया और लोगों को प्लेग से बचाने के लिए सभी वैज्ञानिक कदम उठाए। मैंने इन सभी समाचारों को अखबार में लिखा और अपने लेखों के माध्यम से लोगों को, अहमदाबाद शहर के नगर निगम के शासकों को और राज्य के स्वास्थ्य विभाग को इस बात से अवगत कराया कि कैसे कोरोना काल में सतर्क रहना है।
मेरे ये लेख प्रकाशित होते ही भारत और गुजरात में कोरोना आ गया। मेरे पाठक कोरोना के बारे में और जानने के लिए उत्सुक थे। मैंने और अधिक शोध किया और अपने अखबार के पाठकों को कोरोना वायरस के बारे में जानकारी दी। मेरी शोध में पाया गया कि कोरोना एक वैश्विक महामारी है। कोरोना एक ऐसा वायरस है जो समय-समय पर अपना आनुवंशिक रूप बदलता रहता है और प्रकृति से लड़ने के लिए खतरनाक हो जाता है। २०१९ में वायरस के नए रूप की पहचान हुई, इसे कोविड-१९ के नाम से जाना जाने लगा। इसका नया रूप इतना खतरनाक है कि यह स्विट्जरलैंड में माइनस २० डिग्री से लेकर, खाड़ी देशों में ५० डिग्री तक के तापमान में जीवित रह सकता है। प्रारंभ के सिर्फ एक ही महीने में, कोरोना वायरस ने इटली में ३३,००० से अधिक, स्पेन में ३०,०००, जर्मनी में ४०,०००, फ्रांस में २०,०००, यूके में २५,००० और संयुक्त राज्य अमेरिका में १,००,००० से अधिक लोगों की जान ले ली। इन सभी विस्तृत तथ्यों को लिखकर मैंने लोगों से कहा कि जागते रहो। यहां तक कि इटली, स्पेन और अमेरिका में कब्रिस्तान भी छोटे हो गये।
मेरे पाठकों को यह जानने में भी दिलचस्पी थी कि कोरोना कहाँ से फैला। गहन शोध के बाद, मैंने लिखा कि चीन के वुहान में एक गुप्त जैविक हथियार पैदा करने की प्रयोगशाला है, जिसे ‘वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ कहा जाता है। जैविक हथियार, परमाणु हथियारों से सस्ते पड़ते हैं। ऐसे जैविक हथियारों के उपयोग के लिए युद्धक विमानों या मिसाइलों की आवश्यकता नहीं होती है। उन्हें बस इतना करना है कि अपने देश के कुछ लोगों को इस तरह की बीमारी से पीड़ित करके दूसरे देशों में भेजना है और कुछ ही समय में वे जिस भी देश में गए हैं, वहां के लोगों को इस भयानक बीमारी से संक्रमित कर देंगे। चीन की इस गुप्त प्रयोगशाला की स्थापना १९५६ में हुई थी। इस संस्थान के संस्थापक चेन हुआ गाई और गाओ सेंचिंग थे। १९७८ में प्रयोगशाला का नाम बदलकर ‘वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ कर दिया गया। इस प्रयोगशाला में काम करनेवाले एक वैज्ञानिक को ही किसी मानवीय भूल से कोरोना हुआ और चीनी शासकों ने इस बात को छिपाया। लेकिन कोरोना दुनिया के दूसरे हिस्सों में फैले उससे पहले, शुरुआत के एक महिने में ही चीन में ३७०० लोगों की मौत हो गई। वास्तव में यह प्रयोगशाला केवल जैविक हथियार बनाने का ही काम कर रही थी। चीनी शहर वुहान की आबादी १,१०,००,००० है। शुरुआत में वुहान में ही १४,००० लोगों को इस बीमारी के साथ अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चीन से कोरोना वायरस की उत्पत्ति का दूसरा कारण गीला बाजार यानि कि जीवों का बाजार है। वुहान शहर के इन जीवों के बाजार में अजगर, कचिंडा, चूहे, तेंदुआ शावक, बिल्ली, मगरमच्छ और चमगादड़ का मांस बेचा जाता है। यहां खुले में इन जानवरों का वध किया जाता है और इस तरह इन जानवरों के मांस में लार, मल, मवाद और अन्य अशुद्धियां मिल जाती हैं और यह भी एक भयानक वायरस पैदा करने का कारण बनता है। वुहान की इस गुप्त प्रयोगशाला ने चमगादड़ों का इस्तेमाल, खतरनाक वायरस पैदा करने के लिए किया था। चमगादड़ के पास लगभग ६० जितने जीवित वायरस भंडार होते हैं। मैंने इस सारी सनसनीखेज जानकारी से मेरे पाठकों को जागरूक किया।
बेशक, कोरोना-कोविड -१९ के गुजरात और देश में प्रवेश करने से पहले, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी ने ८ मार्च, २०२० को लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए, सुबह ७:०० बजे से रात ९:०० बजे तक की अवधि के लिए जनता कर्फ्यू की घोषणा की। यह हम सभी के लिए एक अभूतपूर्व अनुभव था। इसके बाद देश में कोरोना फ़ैलने के कारण प्रधानमंत्री ने देश में तालाबंदी की घोषणा की। पूरे शहर में जनजीवन ठप हो गया। किसी को भी बाहर जाने की अनुमति नहीं थी, हालांकि मैंने विशेष अनुमति के साथ एक पत्रकार के रूप में अपना कर्तव्य जारी रखा। कड़े कर्फ्यू के बावजूद मैं अपने अखबार के दफ्तर जाता रहा। अभी तक कोरोना की वैक्सीन नहीं आई थी। शहर के अस्पताल कोरोनाग्रस्त मरीजों से खचाखच भरे हुए थे। कोरोना की कोई खास दवा भी नहीं थी। इस स्थिति में समय-समय पर मास्क पहनने और सामाजिक दूरी बनाए रखने के दिशा-निर्देश देते हुए मैंने लेख लिखना जारी रखा और संदेश समाचार चैनल की बहस में भी भाग लिया। मैंने सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को सामाजिक दूरी बनाए रखने की और बार-बार हाथ धोने की, बार-बार हाथ मिलाने के बजाय अभिवादन करने की सलाह दी। इससे लोगों में जागरुकता भी पैदा हुई।
फिर भी, सितंबर में मैं ही बीमार पड़ गया। मैंने अपने खून की जांच कराई। मुझे कोरोना-कोविड-१९ का पता चला। मेरे घर के सभी सदस्य घबरा गए। डॉक्टरों ने मुझे अपने बेडरूम में ही रहने की सलाह दी। मैं होम क्वारंटाइन हो गया। मुझे कमरे के दरवाजे से मेरे बेडरूम में एक कागज़ के बर्तन में खाना दिया जाता था। मैंने अपने कपड़े भी अपने बाथरूम में खुद धोए। मुझे बुरी तरह से खांसी भी थी। बुखार भी था। यहां तक कि डॉक्टरों को भी इस बीमारी का अनुभव नहीं था, इसलिए उन्होंने कई तरह की गोलियां दीं। मुझे एक दिन में १९ गोलियां खानी पडती थी । इनमें एंटीबायोटिक्स से लेकर स्टेरॉयड तक शामिल हैं। मैं अपने बेडरूम में १४ दिनों तक बंद रहा। मेरे कमरे में कोई नहीं आ रहा था। केवल मेरी पोती डॉ. अनुष्का पटेल, जो अहमदाबाद की वा.सा.अस्पताल में एम.डी. कर रही थी और कोरोना वार्ड में ही ड्यूटी पर थी। वह हिम्मत के साथ मेरे कमरे में आती थी और मुझे देखती थी। इस स्थिति में भी, मैं अपने कमरे में बिस्तर पर बैठकर, अपना नियमित कॉलम लिखता रहा और अपने अखबार के कार्यालय में भेजता रहा। मैंने अपने पाठकों को यह नहीं बताया कि इस कॉलम के लेखक कोरोना से बीमार है। मैंने अपने कार्यालय के कर्मचारियों को भी सूचित नहीं किया था। कोरोना होने के १४ दिन बाद मैं ठीक हुआ और मुझे अपना कमरा छोड़ने की इजाज़त मिल गई। अगले १४ दिनों तक मैं अपने होम क्वारंटाइन में ही रहा, यानी मेरे घर में ही रहा। ठीक एक महीने बाद मैं अपने घर से बाहर निकला, लेकिन कमजोरी ३ महीने तक रही। मेरी पोती अनुष्का की शादी नवंबर के महीने में तय हुई। मैं शादी में भाग लेने में सक्षम था। लेकिन इस दौरान मैंने बिना किसी रूकावट के अपने अखबार के माध्यम से कोरोना के बारे में जन जागरूकता अभियान जारी रखा।
मेरे जीवन का लक्ष्य पत्रकारिता के साथ-साथ सामाजिक कार्य भी रहा है। मेरा परिवार भी उसी चिली में चलता है। मेरी पोती डॉ. अनुष्का पटेल कोरोना महामारी के दौरान पढ़ रही थीं, फ़िर भी पी.पी.ई. किट पहनकर वा.सा. अस्पताल के कोरोना वार्ड में ड्यूटी पर थी और वह कोरोना मरीजों का इलाज कर रही थी। यह मेरे परिवार के लिए गौरव का विषय रहा है।
कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान, जब शहर के सभी अस्पताल मरीजों से भरे हुए थे, मैंने अपने गांव से आये कई गरीब मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराने में मदद की। कोरोना की दूसरी लहर इतनी खतरनाक थी कि मैंने अपने कुछ रिश्तेदारों और दोस्तों को खो दिया। मेरी बहू सुधा की माँ को जब कोरोना हुआ, तो शहर के किसी भी अस्पताल में कोई जगह नहीं थी। बड़ी मुश्किल से उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। कुछ दिनों बाद वह कोरोना से मुक्त हो गए, लेकिन कोरोना के साइड इफेक्ट के कारण उनका खून गाढ़ा हो गया और उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई। यह हमारे परिवार के लिए बहुत बड़ा सदमा था।
कोरोना महामारी की विषम परिस्थितियों में भी मैंने लेखन से अपना ध्यान भटकने नहीं दिया। लॉकडाउन के दौरान ही मैंने अपने उपन्यास ‘अलंकृता’ पर आधारित फिल्म की पटकथा भी लिखी थी। उसी तरह, आनेवाले वर्षों में नई पीढ़ी को कोरोना की महामारी का एहसास कराने में मदद करने के लिए मैंने ‘द ग्रेट कोरोना वॉरियर’ नामकी किताब लिखी। यह किताब कोरोना महामारी की दूसरी लहर से ठीक पहले प्रकाशित हुई थी। मैंने यह किताब भारत के लोकप्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को समर्पित की और मैंने उन्हें उपहार के रूप में वह किताब भी भेजी।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रभाई मोदी ने देश के लोगों को कोरोना महामारी के भयानक परिणामों से बचाने के लिए पहले जनता कर्फ्यू लगाया और फिर भारत जैसे बड़े देश में तालाबंदी की घोषणा करने के लिए समय पर कदम उठाया। इसके बारे में मैंने इस पुस्तक में विस्तार से लिखा। प्रधानमंत्री ने सबसे पहले जनता कर्फ्यू की घोषणा की, इसके बाद उन्होंने तालाबंदी की घोषणा की। देश के ९० करोड़ गरीब लोगों के लिए प्रधानमंत्री ने मुफ्त अनाज देने की घोषणा की। इस योजना के कारण केंद्र सरकार पर भले ही ९०,००० करोड़ रुपये का बोझ पड़ा हो, लेकिन उन्होंने निर्भीकता से गरीबों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने की योजना की घोषणा की। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने प्रवासी मजदूरों के लिए ५०,००० करोड़ रुपये की योजना की घोषणा की। प्रधानमंत्री ने तालाबंदी के कारण शहर छोडकर अपने वतन लौट रहे प्रवासी श्रमिकों के लिए वर्ष में १२५ दिनों के लिए ५०,००० करोड़ रुपये की एक गरीब कल्याण योजना की घोषणा की। अपने वतन लौट रहे प्रवासी मजदूरों के लिए विशेष ट्रेन चलाई। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सार्क देशों को एकजुट करने की पहल की। श्रमिकों, प्रवासी श्रमिकों, खेत मजदूरों के लिए करोड़ों रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की। जिसमें स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करनेवाले लोगों को केंद्र सरकार की ओर से ६ महीने के लिए ५० लाख रुपये का बीमा दिया गया। ३ करोड़ विधवाओं, विकलांगों और बुजुर्गों को ३ महीने के लिए १०००/- रुपये की सहायता प्रदान की गई। पी.एम. सम्मान निधि के तहत – यानी प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत ८.६९ करोड़ लाभार्थी किसानों को इस योजना का लाभ मिला। प्रधानमंत्री ने संयुक्त राज्य अमेरिका को हाइड्रोक्लोरोक्वीन की २.०९ करोड शीशियाँ भेजीं।
इन सभी मुद्दों के अलावा, मैंने इस पुस्तक में उन सभी विषयों को शामिल किया, जैसे कि कोरोना कहाँ से फैला, देश में कितने लोग कोरोना से अभिभूत हुए और चीन और डब्ल्यूएचओ प्रमुख की आपसी साँठ-गाँठ किस तरह की है। ऐसे समय में जब दुनिया के तथाकथित आधुनिक देशों के नागरिक भी कोरोना वैक्सीन लेने को लेकर आशंकित थे, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भारत में निजी दवा कंपनियों को कोरोना के लिए स्वदेशी वैक्सीन विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया और भारत में ही बनाई गई यह वैक्सिन देश के करोडो लोगों को निःशुल्क उपलब्ध हो सके, उसके लिए कड़ी मेहनत की। प्रधानमंत्री के इन्हीं प्रयासों से देश की जनता भीषण कोरोना महामारी से बची और इसलिए मैंने प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए ‘द ग्रेट कोरोना वॉरियर’ पुस्तक लिखी। सचमुच, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रभाई मोदी कोरोना के महायुद्ध के खिलाफ लड़नेवाले एक महान योद्धा साबित हुए। मुझे लगता है कि कोरोना काल के दौरान लिखी गई ‘द ग्रेट कोरोना वॉरियर’ पुस्तक, वैश्विक कोरोना महामारी के समय देश और दुनिया की क्या स्थिति थी और कैसे भारत सबसे बडे नुकसान से बच गया यह जानने के लिए यह पुस्तक आनेवाली पीढ़ियों के लिए एक ऐतिहासिक दस्तावेज सिद्ध होगी। कोरोना काल की घटनाओं का दस्तावेजीकरण करके मैंने भी एक छोटे कोरोना योद्धा के रूप में काम किया, इस बात का मुझे बेहद संतोष है।…..DEVENDRA PATEL



